श्री गणेश जी हिन्दू धर्म में बुद्धि के देवता के रूप में पूजे जाते हैं। एक बार गणेशोत्सव में गणेश जी के दर्शन करते-करते कुछ मेरे मस्तिष्क में उपजा। उस कुछ ने मुझे झकझोर दिया और विवश होकर वह मुझे आप तक पहुंचाए बिना मेरा मन नहीं रूक सका। आपको विस्तार से मैं उसे आप तक प्रेषित करती हूँ।
गणेश जी की मूर्ति देखकर मेरे मन में यह प्रश्न उभरा, इनका ललाट इतना बड़ा क्यों है, इन के कान कुछ अधिक ही बड़े क्यों हैं, सूंढ़ इतनी लम्बी की मुँह तक ढ़क जाता है, हाथ भी चार है और सवारी के नाम पर चूहा। तभी लगा इसके पीछे कुछ तो है।
गणेश जी का चौड़ा ललाट बुद्धि का प्रतीक है। ललाट चेहरे के अग्र भाग पर स्थित होता है याने शरीर के सभी अंगों में बुद्धि का स्थान प्रथम है। यदि पहले अपनी बुद्धि से किसी काम को करें तो वह बहुत सी कठिनाइयों से बच सकता है।
ईश्वर ने शायद स्वयं को मनुष्य की बुद्धि में सूक्ष्म रूप में अपने आपको स्थापित कर लिया है। वह तो मनुष्य अपने अज्ञान से इस छिपे हुए ईश्वर को नहीं पहिचान पाता तभी तो वह बुद्धि का मात्र पांच प्रतिशत ही उपयोग करता है।
गणेश जी के बड़े-बड़े कान यह संदेश देते लगते है कि सुनो सबकी, श्रेष्ठ श्रोता बनो क्योंकि बात विभिन्न मस्तिष्कों से आने वाली आवाज है और यह तय करो किसमें कितनी बुद्धि है। आप यह भी कह सकते हैं जिन शब्दों व विचारों को कोई कहता है वह उसकी बुद्धि के पैमाने का दर्पण सहष्य होता है। सबकी सुनने के बाद आत्म चिंतन कर अपने हिसाब से उसका उपयोग करो। हमारा ज्ञान सुनने से बढ़ता है न कि अधिक बोलने से। एक बात और है अधिक बोलने से बातों बातों में न बताने वाला कुछ भी बाहर आ जाता है।
गणेशजी में सबसे अधिक ध्यान खींचती है उनकी सूढ़। नाक का काम है सूंघना लम्बी सूंढ़ याने ज्यादा सूघों। हम अपनी नाक से सुगंध दुर्गंध भर सूंघते हैं। गणेशजी की सूंढ़ कहती है दूर तक की सूघों, गंध, दुर्गंध से अधिक आदमी, वातावरण, हवा का रूख सूंघो। यह जानकारी एकत्र करने का एक नायाब तरीका है। यह आपको अपने जीवन को संवारने, कठिनाइयों से उबारने की क्षमता रखता है।
गणेश जी का पेट जरूरत से ज्यादा ही बड़ा होता है। इसके पीछे लगता है दो कानों से सुनी हुई बात, सूंढ़ से सूंघी हुई बात अपने पेट में रखो। अनुभव स्वयं किया जाता है उसे बांटा नहीं जा सकता क्योंकि अनुभव अपनी बुद्धि द्वारा व्यक्तियों व परिस्थितियों के आंकलन की अनुभूति है।
हर शुभ कार्य के पहले गणेश पूजा द्वारा हम अपने अंदर बैठे बुद्धि रूपी ईश्वर की पूजा करते है। हम अपने शरीर की तुलना कुरूक्षेत्र में रथ पर सवार अर्जुन से कर सकते हैं जिसकी बुद्धि की लगाम श्री कृष्ण के हाथ में थी। यदि हम अपने शरीर का उपयोग अर्जुन की तरह और बुद्धि का श्री कृष्ण की सीख की तरह करते हैं तो जीवन रूपी कुरूक्षेत्र विजय की विजयश्री हमारा ही वरण करेगी।
आशा श्रीवास्तव
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