भारत में वर्ष में छह ऋतुं होती है -ग्रीष्म, वर्षा, शरद हमेंत, शिशिर और बंसत । अंग्रेजी वर्ष चक्र के अनंसार वर्षा ऋतु उत्तर भारत मेंप्राय: जुलाई सये प्रारभं होकर सितंबर तक रहती है । ग्रीष्म ऋतु में जब जड़-चेतन प्रकृति ग्रीष्म से व्याकुल होकर हाहाकार करने लगती है तो प्रकृति देती उनकी सुनवाई करती है और उस समय समुद्र का पानी वाष्प बनकर आकाश में उड़ता है।
वह हवा से ठंडा होकर मेघ मन जाता है। वहीं मेघ जहां बरसता है तो वर्षा कहलती ह। बंसत को ऋतुओं का राजा कहा गया है तो वर्षा को ऋतुओं की रानी । इस ऋतु में मेघों से रिमझिम- रिमझिम बरतसता पानी मन को महोह लेता है । तुलसीदास ने भीं मानस में लिखा है-
'' वर्षा काल मेघ नभ छाए।
गरजत लागत परम सुहाए।
दामिनी दमक रही घन माही।
खल की प्रीति जथा थिर नाही॥ "
मध्य जून से तटवर्ती क्षेत्रों से मानसून आने लगता है और जून-समाप्ति अथवा जुलाई लगते ही पा्रय: सारे भारतवर्ष में फैल जाता है । जब वर्षा क पहले मेघ आकाश में घिरते है,पहली फुहार के साथ देखते ही देखते वर्षा की झड़ी लग जातीहै तो जन-जीवन को चैन की साँस मिहलती है । सड़कें और गलियाँछोटी सी नदी का रूप धारण कर लेती है। बच्चे खुशी से भरकर बाहर निकल आते है। और कागत की छोटी छोटी नाव बनाकर उसे पानी में तैराते हुए और परनी में छप-छप करके उसे पानी में तैराते हुए ओर पानी में छप-छप करके खेलते हुए वर्षा का आनंद लेते है। पक्षी चहचहाने लगते है। कुम्हालाएं पेड़-पौधे हरे हो उठते है। प्रकृति में सर्वत्र हरियाली छा जाती है। जन-मानस में नए उमंग वे जोश का संचार होता हे। भारत एक कृषि प्रधान देश है इसलिए वर्षा के आगमन से ही किसानों की खुशी भी बढ़ जाती है। पूरी प्रकृति जैसे अपने चरम पर होती है। पत्तियों की धुल घुलने से उनमें एक नई चमक व ताजगी आ जाती है। पेड़-पौधे पुरवैया हवा में हिलते ऐसे लगते है।,मानों वे भी नाच-नाचकर झूम-झूमकर तथा सरर-सरर की मधुर ध्वनि में गा-गाकर वर्षा की रानी का शुभ स्वागत कर रहे है। पशुओं में भी जैसे नई खुशी का संचार हो जाता है। तालाबों व नदियों के किनारे बैठे मेंढ़कों की टर्र-टर्र आवाजें और मोर का अपनी धुन में थिरक-थिरक कर अपनी खुशी का इजहार करना इस बात का सूचक है। खेतों , बाग -बगीचों में टिमटिमाते जुगनु बहुत ही आकर्षक लगते हैं । रात के अंधेरें में चमकती बिजली किसी को प्रसन्न करती है, किसी को भयभीत करती है, तो किसी के सूने मन में किसी की याद के घाव को हरा कर देती हें कई गावों में वर्षा के आने की खुशी में वहाँ के रह-वासियों द्वारा अलग-अलग प्रकार के लोक-गीत गाये जाते है। तुलसीदास ने लिख है:-
'' दादुर धुनि चहुँ ओर सुहाई।
वेद पढें ज़नु बहु समुदाई॥''
कई गॉवों में इस दौरान सावन के मेलों का भी आयोजन किया जाता है। पूरे देश्या में वर्षा आरंभ होते ही वन-महोत्सव मनाया जाता है। सभी लोग नये-नये पौधे रोपते हैं। इसके साथ ही साथ वर्षा ऋतु अपने साथ कई अन्य त्यौहार भी लेकर आती है जिन्हें हमारे देश्या में सभी लोगों के द्वारा बहुत हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। :जैसे - जगन्नाथ भगवान की रथ-यात्रा का आयोजन, हरेली त्यौहार जो गाँव के लोगों द्वारा मनाया जाता हे, सावन सोमवार का महीना जिसमें कुवारियों व महिलाओं द्वारा भगवान शंकर का व्रत रखा जाता हैं,उनरके मंदिरों,शिवालयों के दर्शन किए जाते है व पूजन तथ व्रत -ज्ञापन जैसे कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है, तीज का त्योहार मनाया जाता है जिसमें महिलाए। अने-अपने घरों में सावन का झूला लगाती हैं व उसमें झूलती है, साथ ही रक्षा-बंधन, जन्माष्टमी तथा गणेश जी के बैठने का समय भी निकट आ जाता है जो कि वर्षा ऋतु के सबसे प्रसिध्द पर्व व त्योहार के रूप में भी जाने जाते है। वर्षा जहाँ इतनी आनंददायिनी है वह कुछ-कुछ कष्टदायिनी भी है। वर्षा की फुहार के साथ वह अपने साथ मक्खी -मच्छरों, पतंगों की सेना भी ले आती है। मलेरियों रोग भी इनका साथ देता है। निर्धनों,अकिंचनों तथा गृहहीनों के लिए तो वर्षा विशेष दुखदायिनी है। निर्धनों की झुग्गियों ,छप्परों तथा मकानों की कच्ची तथा टूटी छतों से पानी की धारें बहने लगती है और उनके घर की सभी वस्तुएं गीली होने के कारण खराब हो जाती है। और सड़ जाती हैष्। कई लोगों के घर भी अत्यधिक वर्षा के कारण आई बाढ़ से डूब जाते है और वे घर से बेघर हो जाते है। बाढ़ के कारण कई किसानों की खेती व फसल बर्बाद हो जाती है। सड़कें टूट जाता है। इसी प्रकार वर्षा ऋतु किसी के लिए वरदान की वर्षा करती है तो किसी पर कोप दृष्टि की । परंतु याद रखिए वर्षा हमारे जीवन का आधार है। इस पर हमारा जीवन और हमारे देश की उन्नति निर्भर करती है। अत: इसका बहुत महत्व है।
कीर्ति ओबेरॉय
Yuva Sandesh Comments
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